Surya Namaskar in Hindi

योगासन की बात करे तो सूर्य नमस्कार को सबसे अच्छा और सही योगासन माना गया है जो सब कर सकते हैं| अगर आप दूसरे किसी भी प्रकार के कोई ब्यायाम अगर ना भी करे और सिर्फ सूर्य नमस्कार के कुछ आसन करे तब भी आप को ब्यायाम और योगासन की पूरी लाभ मिलेंगे| यह करने से हमारे स्वास्थ निरोग तो होता ही है साथ ही यह हमारे चेहरे पर एक ऊर्जा लेकर भी आता है| सूर्य नमस्कार बहार तरीकों से किया जाता है उस बारे में आइये कुछ जान लेते हैं-

सूर्य नमस्कार के बारे में

सूर्य नमस्कार के बारे में जानने से पहले आइये हम चक्रो की बारे में कुछ बाते जान ले| चक्र पर ध्यान केंद्रित करने से ही सूर्य नमस्कार सम्पूर्ण होती है|

हमारे चक्र की संख्या सात – मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा और सहस्रार| पहला चक्र है मूलाधार, जो हमारे गुदा और जननेंद्रिय के बीच में होता है| दूसरा चक्र स्वाधिष्ठान चक्र जननेंद्रिय के ठीक ऊपर होता है| तीसरा मणिपूरक चक्र नाभि के नीचे होता है| चौथा अनाहत चक्र हृदय के स्थन में पसलियों के मिलने वाली जगह के ठीक नीचे होता है| पांचवा विशुद्धि चक्र कंठ के गड्ढे में होता है| छठा आज्ञा चक्र  दोनों भवों के बीच होता है| सातवा यानि सहस्रार चक्र, जिसे ब्रम्हरंद्र्र भी कहते हैं, सिर के सबसे ऊपरी जगह पर होता है, जहां किसी नवजात बच्चे के सिर में ऊपर सबसे कोमल जगह होती है|

Surya Namaskar In Hindi

प्रणामासन

अपने दोनों हात एकसाथ जोड़कर सीधे खड़े रहे और अपने आँखों को बंद कर ले और अपने ध्यान को आज्ञा चक्र में केंद्रित करने की साथ सूर्य का आह्वान करे| इस दौरान अगर आप किसी मन्त्र ध्यान केंद्रित करने के लिए बोलना चाहते हैं तो ‘ॐ मित्राय नमः’ का जप कर सकते हैं|

हस्त उत्तानासन

अपने श्वास भरते हुए दोनों हाथों को कानों से लगाते हुए ऊपर की ओर तानें तथा भुजाओं और गर्दन को पीछे की ओर झुकाएं| ध्यान को गर्दन के पीछे ‘विशुद्धि चक्र’ पर केन्द्रित करें|

उत्तानासन

आप अपने श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए आगे की ओर झुकाएं| हाथ गर्दन के साथ, कानों से लगे  हुए नीचे जाकर पैरों के दाएं-बाएं भूमि का स्पर्श करें और अपने घुटने सीधे रखे| सिर घुटनों का स्पर्श करता हुआ ध्यान नाभि के पीछे ‘मणिपूरक चक्र’ पर केन्द्रित करे और कुछ समय इसी स्थिति में रुकें| इसमें ध्यान में रखे की कमर एवं रीढ़ के दोष वाले इसे अभ्यास न करें|

अश्व संचालनासन

श्वास को भरते हुए बाएं पैर को पीछे की ओर ले जाएं| अपने छाती को खींचकर आगे की ओर लाये| गर्दन को थोड़ा अधिक पीछे की ओर झुकाएं| टांग तनी हुई सीधी पीछे की ओर खिंचाव के साथ और पैर का पंजा खड़ा हुआ रखना चाहिए| इस स्थिति में कुछ समय रुके रहे| ध्यान को ‘विशुद्धि चक्र’ पर ले जाएँ और मुखाकृति सामान्य रखें|

चतुरंग दंडासन

श्वास को धीरे-धीरे बाहर छोड़ते हुए अपने दाएं पैर को पीछे ले जाएं| दोनों पैरों की एड़ियां साथसाथ मिली हुई हों| पीछे की ओर शरीर को खिंचाव देते हुए एड़ियों को पृथ्वी पर मिलाने का प्रयास करें| अपने नितम्बों को अधिक से अधिक ऊपर उठाएं| गर्दन को नीचे झुकाकर ठोड़ी को कण्ठकूप में लगाएं। ध्यान ‘सहस्रार चक्र’ पर केन्द्रित करने का अभ्यास करें|

अष्टांग नमस्कार

श्वास को भरते हुए शरीर को भूमि के समान, सीधा साष्टांग दण्डवत करें और पहले घुटने, छाती और माथा पृथ्वी पर लगा दें| नितम्बों को थोड़ा ऊपर उठा दें| धीरे धीरे श्वास छोड़ दें| ध्यान को ‘अनाहत चक्र’ पर टिका दें| श्वास की गति को सामान्य कर दे|

भुजंगासन

इस स्थिति में धीरे-धीरे श्वास को भरते हुए छाती को आगे की ओर खींचते हुए हाथों को सीधे कर दें| गर्दन को पीछे की ओर ले जाएं| घुटने भूमि का स्पर्श करते हुए पैरों के पंजे खड़े रहें| मूलाधार को खींचकर वहीं ध्यान को केंद्रित करे|

अधोमुक्त श्वानासन

श्वास को धीरे-धीरे बाहर छोड़ते हुए दाएं पैर को भी पीछे ले जाएं| दोनों पैरों की एड़ियां एकसाथ मिली हुई हों| पीछे की ओर शरीर को खिंचाव दें और एड़ियों को पृथ्वी पर मिलाने का प्रयास करें| नितम्बों को अधिक से अधिक ऊपर उठाएं| गर्दन को नीचे झुकाकर ठोड़ी को कण्ठकूप में लगाएं| ध्यान ‘सहस्रार चक्र’ पर केन्द्रित करने का अभ्यास करें|

अश्व संचालनासन

इसमें श्वास को अंदर भरते हुए बाएं पैर को पीछे की ओर ले जाएं| छाती को खींचकर आगे की ओर प्रसारित करे| गर्दन को थोड़ा अधिक पीछे की ओर झुकाएं| टांग प्रसारित किये हुए सीधी पीछे की ओर खिंचाव दे और पैर का पंजा खड़ा हुआ रखे| इस स्थिति में कुछ समय तक रुके रहे| ध्यान को ‘स्वाधिष्ठान’ अथवा ‘विशुद्धि चक्र’ पर ले जाएँ मतलब अभ्यास करे केंद्रित करने की, साथ  मुखाकृति सामान्य रखें|

उत्तानासन

इस स्थिति में श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए आगे की ओर झुकाएं| हाथ गर्दन के साथ, कानों से लगे हुए नीचे जाकर पैरों के दाएं-बाएं पृथ्वी का स्पर्श करें| अपने घुटने सीधे रखे| सिर घुटनों का स्पर्श करता हुआ ध्यान नाभि के पीछे ‘मणिपूरक चक्र’ पर केन्द्रित करते हुए कुछ क्षण इसी स्थिति में रुकें| कमर एवं रीढ़ के दोष वाले ब्यक्ति इसे न करे तो सही रहेगा|

हस्त उत्तानासन

अंदर श्वास भरते हुए दोनों हाथों को कानों से लगाते हुए ऊपर की ओर प्रसारित करे तथा भुजाओं और गर्दन को पीछे की ओर झुकाएं| ध्यान को गर्दन के पीछे ‘विशुद्धि चक्र’ पर केन्द्रित करने की कोशिश करे|

प्रणामासन

यह स्थिति बिलकुल पहली स्थिति की जैसे ही रहेगी, बिलकुल उसी प्रकार से इसे करे और चाहें तो ॐ भास्कराय नमः मंटा का जप कर सकते हैं|

अब जान लेते हैं सूर्य नमस्कार से होनेवाले कुछ विशेष लाभ

  • हमारे त्वचा बहुत ही अच्छी और खिली खिली हो जाती है अगर आप सूर्य नमस्कार रोज अभ्यास करेंगे तो|
  • कॉन्स्टिपेशन यानि कब्ज की समस्या भी कम होती है कई हद तक यह व्यायाम अभ्यास करने से|
  • इस अभ्यास के द्वारा हमारे शरीर की छोटी-बड़ी सभी नस-नाड़ियां क्रियाशील हो जाती है जिससे रक्त संचालन अच्छी होती है|
  • यह अभ्यास अगर आप रोज करेंगे तो आपको किसी भी काम को करने में एक अलग ऊर्जा मिलेगा और आप अच्छे से मन लगा के कोई भी काम कर सकेंगे|
  • अनिद्रा जैसी समस्या में भी सूर्य नमस्कार काफी अच्छा फल देता है और जिन्हे रातो को नींद न आने की समस्या है उन्हें अच्छी और सही नींद आती है|
  • जो छात्र और छात्राय पढ़ाई कर रहे हैं उनके लिए सूर्य नमस्कार बहुत ही ज्यादा लाभदायक होता है क्यों कि यह मन को एकाग्र करने में विशेष रूप से मदत करती है|
  • यह अभ्यास हमारे शरीर में ताकत को बढ़ाने ने भी मदत करता है जिससे हमारे हड्डीओं में भी मजबूती आती है|

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